Justice Deepak Mishra Is Now Chief Justice Of India

Justice Deepak Mishra sworn in as 45th Chief Justice of India on Monday. Deepak Mishra took over from Justice Jagdish Singh Khehar and third person from Orissa to be Chief Justice of India.

New Delhi: On Monday morning, Chief Justice Deepak Mishra sworn in as the 45th Chief Justice of India taking over Justice Jagdish Singh.

Justce Mishra will preside over the top court for 13 months and six days. Mishra became advocate in 1977 and practiced Constitutional, criminal, Civil, Revenue, Service tax matters in Orissa High Court.

He took charge of the office of Chief Justice, Patna High Court in 2009 and of Delhi High Court in 2010.

In 2011, he was elevated as Supreme Court Judge.

4 Responses

  1. Avinash Shukla says:

    अधिवक्ता बंधुओं,

    आप लोंगों ने कहावत सुनी होगी, ‘जिस देश का बचपन भूँखा हो, उसकी जवानी क्या होगी।’ मैं कहता हूं,’जिस देश का वकील बीमार हो, उसकी न्याय व्यवस्था क्या होगी।’ हमारे देश में केवल वही वकील अच्छे स्वास्थ्य का लाभ प्राप्त कर रहे हैं जो नौकरी से रिटायर होने के पश्चात वकालत में एनरोलमेंट कराते हैं और लाखों-करोङो के रिटायरमेंट फण्ड और लाख-पचास हजार की मासिक पेंशन का लाभ प्राप्त करते हुए वकालत कर रहे हैं। ये लोग अपनी बैकग्राउंड का फायदा उठा कर तमाम सरकारी संगठनों और बैंकों इत्यादि के वकील भी बन जाते हैं और जम कर पैसा कमाते है। पूर्व सरकारी कर्मचारी होने के कारण इनको और इनके परिवारजनों को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं भी जीवनपर्यन्त मिलती रहती हैं। वहीं दूसरी ओर वे अधिवक्ता हैं जिन्होंने अल्पायु में ही वकालत को अपना पेशा बनाया। ये अधिवक्ता 40 से 45 वर्ष की आयु तक पहुँचते पहुँचते ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, हाइपरटेंशनल जैसी बीमारियों से ग्रसित हो जाते है। दोस्तों, वकालत एक अत्यंत अनिश्चित प्रकृति का पेशा है। इस पेशे में कार्यरत वकील को हमेशा मानसिक तनाव का सामना करता पड़ता है। स्ट्रेस ही समस्त बीमारियों का केंद्र है। सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं के आभाव में वकीलों को अपना इलाज स्वयं कराना पड़ता है। जरा सोचिए, अगर वकील बीमार हो जाए और कुछ समय के लिए उसको बेड रेस्ट करना पड़ जाए या अस्पताल में भर्ती होना पड़ जाए तो उसकी वकालत से होने वाली आय तो बंद हो जाती है, लेकिन घर-परिवार और इलाज पर होने वाला खर्च चालू रहता है। कहने का आशय यह है कि वह दोहरी मार झेलता है। सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को न्यायालय का जिम्मेदार अधिकारी तो बना दिया लेकिन सरकार को यह निर्देश देने की आवश्यकता नही समझी कि न्यायालय के इन जिम्मेदार अधिकारियों और उनके परिवारजनों के मुफ्त इलाज के लिए केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत प्रत्येक न्यायालय परिसर में डिस्पेंसरी स्थापित की जाए। सरकार ने भी अपनी नियमावली में वकीलों को सीनियर क्लास वन अधिकारी तो बता दिया लेकिन इस बात पर कभी विचार नही किया कि इन सीनियर क्लास वन अधिकारियों की स्वास्थ्य समस्याएं भी हैं। शायद सरकार और न्यायपालिका का यह मानना है कि वकीलों के पास बहुत पैसा है। मैं आपको एक छोटा सा किस्सा सुनाता हूँ। एक बार कानपुर के जिला जज महोदय ने आदेश पारित कर दिया कि सभी वकील गाउन पहन कर न्यायालयों में उपस्थित होंगे। कुछ वकील जिला जज के पास गए और कहा कि गाउन तो हम लोंगों के पास है नही, खरीदना पड़ेगा और पैसे हम लोंगों के पास हैं नही, कैसे खरीदे। ज़िला न्यायाधीश बोले, वकीलों को अच्छी तरह से मालूम है कि गाउन खरीदने के पैसे कहां से आएंगे। मैं तो बस वकीलों को गाउन में देखना चाहता हूं। शायद न्यायपालिका और सरकार समझते हैं कि वकील लाखों-करोङो रुपये खर्च करके बार एसोसिएशन/बार कौंसिल का चुनाव लड़ सकते हैं तो अपना इलाज भी करा सकते हैं। किंतु ऐसे वकील .01 प्रतिशत ही होंगे। 99.99 प्रतिशत वकीलों की हैसियत चुनाव लड़ने की नही होती। अतः मैं फेसबुक के माध्यम से न्यायपालिका और सरकार, दोनों से अनुरोध करता हूँ कि वकीलों को स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाने की दिशा में कदम उठाएं। बार कॉउन्सिल/बार एसोसिएशन इस दिशा में सार्थक पहल कर सकते है।

  2. आरक्षड केवल उनको ही मिलना चाहिए जो कि आर्थिक इस्तिति से कम जोर हो चाहे वो किसी भी जाती या धर्म का हो, एक जरनल के घर की इनकम 40000 हज़ार ह ओर एक एससी/ एसटी के घर की इनकम 200000 लाख से ज्यादा है तो कोण गरीब है किसको आरक्षड मिलना चाहिए ,फैंसला आपके हाथ है क्या करना है,

  3. Love tiwari says:

    क्या सर्वोच्च न्यायालय अपने संवैधानिक निर्वचनों और संशोधनों व निर्णयों से होने वाले दुष्प्रभाव से जन सामान्य को इंश्योर करेगी ।
    कोई ऐसी व्यवस्था बची है क्या भारत मे के बंद के नाम पर दानवता न फैलायी जा सके ।
    अरबों रुपयों की पब्लिक प्रोपर्टी को कौन इंश्योर करे
    सरकार या
    कोर्ट या
    कानून

    जिस कानून से लोग दूसरों को डरा रहे हैं।
    उसी कानून का ख़ौफ़ नही खुद उन्हें।
    सर्वोच्च न्यायालय को भविष्य में होने वाले ऐसे फूहड़ बन्द से होने वाले नुकसान जानमाल की क्षतिपूर्ति हेतु दिशानिर्देश तय करने होंगे अन्यथा जिस प्रकार कानूनों के दुरूपयोग का चलन बड़ रहा है वेसे ही बंद का दुरुपयोग भी होगा होता ही रहेगा।

    बन्द के समय किसकी जिमेदारी तय की जाये ।
    स्वाभाविक है
    बन्द आयोजकों की
    जिस बेनर के तहत बन्द किया जा रहा है उनके अध्यक्ष व अन्य सदस्यों की जिमेदारी पहली है
    उसके बाद सरकार की
    फिर पुलिस की

    कानून बनाया जाए कि किसी भी प्रकार के बन्द के दौरान पुलिस को सभी अधिकार होंगे किसी की परमिशन की जरूरत नही होगी ।

    प्रत्येक इंडिविजुअल कानूनों में यह भी समाहित हो कि यदि लगाये गए आरोप असत्य पाये गए तो रिपार्ट करने वाले को भारी क्षतिपूर्ति करनी होगी ।

    बन्द हड़ताल ओर धरना आंदोलन जुलूस कवायद etc के लिए पृथक कानून बनवाया जाये । और सख्त सजा का प्रावधान रखा जाए।

    बन्द की कीमत देश को लम्बी अवधि तक चुकानी होती है जातिगत वैमनस्यता से लोकतंत्र भी कमजोर होता है साथ ही इसमें राजनीतिक संलिप्तता भी होती है ।
    इस कारण किसी भी प्रकार के बन्द में यदि कोई राजनीतिक दल इन्वॉल्व हो तो उसकी पार्टी का पंजीयन तत्काल निरस्त करने का प्रावधान भी होना चाहिये।
    और आगे से कोई अंटशंट कानून बनाकर सर्वोच्च न्यायालय खुद अपनी नाक भी न कटाये ।
    न्यायालय का लिबरल होने का समय अब नही रहा है ।

    भारत मे दण्ड का भयोपकारी सिद्धांत लागू करना आवश्यक हो गया है।

    एक नजर उन सामान्य कानूनों पर जिनका 90 प्रतिशत दुरूपयोग किया जा रहा है ।
    आरक्षण
    डोमेस्टिक वॉयलेंस
    498 अ ipc
    125 cr pc
    Stsc act
    आदेश 21 सीपीसी

    घ्रणित लोग नीचता की पराकाष्ठा पार कर सामान्य कानून अल्ट्रेशन पर लोगो को नोच रहे हैं । राष्ट्र की सम्पत्ति को आग लगा रहे हैं और वो भी केवल राजनीतिक मन्तव्य से।

    घटिया बेहद घटिया

    जय हिंद जय भारत

    लव तिवारी अभिभाषक
    जीरापुर
    9893866788

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